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गांधीजी जब साधना मार्ग में नए थे तो कहते थे कि ‘ईश्वर सत्य है’। सबको लगता था कि यह कहकर वे अपनी आस्तिकता साबित करते हैं। इसमें कौन सी बड़ी बात थी। लेकिन निरी भौतिकता के जोर में आस्तिकों को घेरनेवाले भी बहुत होते थे। आज भी होते हैं। फिर गांधीजी सत्य के साधक भी थे और शोधक भी। उनको सत्य का ‘अनुभव’ होता था। ‘अनु’ का अर्थ है पीछे को और ‘भव’ का अर्थ है उत्पन्न होना। तो प्रयोग के बाद उत्पन्न हुआ ज्ञान ही अनुभव है। गांधीजी अपनी साधनापरक अनुभव से अपनी बात कहते थे। वे शास्त्रियों की भाषा में बात नहीं करते थे। उन्हें अपनी यह बात ठीक से समझाने की जरूरत लगी। तब उन्होंने अपनी उसी बात को ठीक से कहा कि ‘सत्य ही ईश्वर है’।

यह तात्कालीन समाज की दृष्टि से एक क्रांतिकारी वाक्य ही था। जबकि उनसे पहले यह बात भगवान महावीर से लेकर बुद्ध भी कह चुके थे। सत्यद्रष्टा ऋषियों ने उपनिषदों में यही उद्घोषणा की थी। संतों और सूफ़ियों ने भी अपनी वाणी में इसी बात को जोर देकर कहा था। लेकिन गांधीजी जैसे अहिंसक सामाजिक सुधारक के लिए इतिहास के उस दौर में यह बात दोहराना चुनौती भरा ही था।  

1927 में जब गांधीजी श्रीलंका गए तो वहाँ के कई बौद्ध आचार्यों के साथ उनका संवाद हुआ। उन्होंने गांधीजी से पूछा कि आप एक साथ ईश्वरवादी और बुद्धमार्गी होने का दावा कैसे करते हैं? गांधीजी ने कहा कि मैं भगवान बुद्ध को अनीश्वरवादी मानता ही नहीं। यह बात बौद्ध आचार्यों को थोड़ी अजीब लगी। तब गांधीजी ने स्पष्ट किया। उन्हें कहा कि ऐतिहासिक कालक्रम में हम धर्म के वास्तविक मार्ग से भटक गए। ईश्वर के बारे में विचित्र-विचित्र मिथ्या धारणाओं के शिकार हो गए। हम उन्हें चढ़ावा और बलि जैसे रिश्वत देकर प्रसन्न करने की अज्ञानता भरी कोशिश में लग गए। तभी बुद्ध का आगमन हुआ और उन्होंने अपने आत्मदर्शन से की गई अनुभूति से जिस सच्चे ईश्वर का साक्षात्कार किया था उसके बारे में लोगों को बताना शुरू किया। इस तरह उन्होंने सत्य नियम रूपी वास्तविक परमात्मा को उसके पवित्र आसन पर पुनः प्रतिष्ठित किया। उन्होंने यह बात जोर देकर समझाई और इस सत्य की एक बार फिर से घोषणा की कि यह संसार कुछ शाश्वत और अटल नैतिक नियमों शासित है। उन्होंने बिना किसी हिचक के कहा है कि यह नियम ही परमात्मा है। गांधीजी की इस बात को बुद्धमार्गियों ने शिरोधार्य किया।

नियम-कानून हम मनुष्य भी बनाते हैं। समाज और व्यवस्था में ऐसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कानून होते हैं। लिखित और अलिखित नियम-कानून चलते हैं। लेकिन मनुष्यों के बनाए कानून अपूर्ण हो सकते हैं। उसमें किसी के साथ मुँहदेखा व्यवहार भी हो सकता है। किसी के साथ रियायत और किसी अन्य के साथ ज्यादती भी हो सकती है। कोई तो बड़े-से-बड़ा अपराध करके भी उन कानूनों के छिद्र से साफ बच निकल सकता है। किसी-किसी को माफी भी मिल सकती है। ऐसे कानून जब चाहें तब बहुमत की मर्जी से बदले जा सकते हैं। वे किसी शासक की व्यक्तिगत सनक से भी बनाए और बदले जा सकते हैं। इसलिए मनुष्यों के बनाए कानून अपूर्ण होते हैं।

जो सत्य का नियम है, जो दैवीय कानून हैं, वे पूर्ण होते हैं। उनकी पूर्णता का कारण उनका स्वतःस्फूर्त होना भी है। उसमें कोई हस्तक्षेप संभव नहीं। उसका कोई व्यक्तिगत कर्ता नहीं। इसलिए उस नियम में न तो मुँहदेखा व्यवहार है और न माफी ही है। उस नियम में इतना ही पुरस्कार है कि हम उस नियम के जितना अनुकूल होकर सत्याचरण करेंगे, उसके मुताबिक हमें उसका सुफल सहज ही प्राप्त होगा। इसी अनुपात में असत्याचरण का कुफल भी प्राप्त होगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि हम प्रार्थना क्यों करें और किसकी करें? जब माफी मिलनी ही नहीं है तो अनजाने में हुई भूल की माफी क्यों मांगें और किससे मांगें? 1926 में हासम हीरजी नाम के एक भाई ने गांधीजी को चिट्ठी लिखकर यही बात पूछी। पत्र का जवाब देते हुए गांधीजी ने लिखा—

“जैसे सरकारी कानून के अनुसार अनजाने में किया हुआ अपराध भी अपराध ही रहता है, वैसा ही दिव्य कानून के बारे में भी है। नशे की धुन में किया गया व्यभिचार भी व्यभिचार ही है। … ‘माफी मांगना और माफी मिलना’ ये दोनों सुंदर वाक्य हैं। मैं इन दोनों का उपयोग करता हूँ। लेकिन माफी का सामान्यतः जो अर्थ कर लिया जाता है वह यहाँ नहीं है, ऐसा मैं हमेशा से मानता आया हूँ। …माफी मांगने की हार्दिक स्थिति में हममें नम्रता बढ़ती है। हम अपने दोष देख सकते हैं। और उसमें से अच्छे बनने का बल प्राप्त करते हैं।”

इसी पत्र में गांधीजी ने आगे कहा— “ईश्वर या अल्लाह के लिए हिन्दू, मुसलमान और ईसाइयों आदि ने अनगिनत विशेषणों की रचना की है, लेकिन ये सब हमारी कल्पना की उपज हैं। …उन विशेषणों को यदि हम सर्वथा सत्य मान लें तो वह ईश्वर भी हमारे समान भूलों का पुतला बन जाए। बाकी कर्मों का फल तो हमें भोगना ही होगा। यह उसका अनिवार्य विधान है। और इसी में कृपा निहित है। यदि वह मनुष्यों की भाँति पक्षपात करे अथवा भूल मालूम पड़ने पर भूल सुधारने के लिए अपने कानून और हुक्म में रद्दोबदल करता रहे, तो यह जगत एक क्षण के लिए भी टिक नहीं सकता। ईश्वर-तत्व (प्रकृति का नियम) एक गूढ़, अवर्णनीय और अनोखी शक्ति है। वहाँ तक हमारे विचार भी नहीं पहुँच सकते, तब बेचारी वाणी तो क्या ही करे।”

गांधीजी ने कितनी स्पष्टता से सत्य का विधान समझाया। लेकिन गांधीजी तो स्वयं भी नियमित रूप से प्रार्थना करते थे। तो कर्मफल भोग की अनिवार्यता और सत्य नियम की अटलता के रहते भी प्रार्थना हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है? आगे इसपर भी यथास्थान चर्चा होगी।

अव्यक्त के प्रणाम

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