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सत्य को हम कैसे समझें? दार्शनिक तर्कणाओं से अलग उसे व्यावहारिक रूप में कैसे समझें? सामान्य अर्थों में हम मानकर चलते हैं कि ‘झूठ न बोलना’ ही ‘सच’ या ‘सत्य’ है। लेकिन सत्य का अर्थ इससे व्यापक है। इतना व्यापक कि गांधीजी ‘सत्य’ को ही ईश्वर कहते थे। वास्तव में सभी सत्यदर्शी ऋषियों, बुद्धों, तीर्थंकरों, संतों और सूफ़ियों ने सत्य या हक़ को ही ईश्वर माना है।   वाणी के सत्य का अर्थ है कि जो चीज जैसी है उसे वैसे ही बताना। जो बात जैसी है उसे वैसे ही कहना। हम जैसे हैं वैसे ही दिखना या दिखाना। यानी कोई भी चीज या बात जो अपने स्वाभाविक रूप में है, बिना मिलावट के है, बिना बाहरी दिखावे के है, वह सत्य है।

गांधीजी कहते थे कि सत्य को समझने के लिए हमें अपने आप को ही देखना पड़ता है। अपने आचरण में आई मिलावट को समझना पड़ता है। मान लीजिए कि मैं किसी व्यक्ति को मन-ही-मन तो बुरा कहता हूँ, लेकिन उसे खुश करने के लिए उसके मुँह पर उसकी प्रशंसा करता हूँ, तो यह असत्य हुआ। इसी तरह, मान लीजिए कि कोई गुण मुझमें वास्तव में नहीं है। लेकिन सांसारिक अर्थों में ‘बड़ा’ या ‘अच्छा’ कहलाने के लिए मैं अपने में वैसा गुण दिखाने की कोशिश करता हूँ, तो वह भी असत्य का आचरण हुआ।

अपने जीवन के असत्य को सत्य साबित करने के लिए हमें बहुत अधिक खर्च और प्रयास करना पड़ता है। इस चक्कर में हमें तरह-तरह के पहनावे और सजने-धजने का सामान, इत्र और सुंदर दिखने के लिए चेहरे पर लगाई जानेवाली रासायनिक सामग्रियाँ, घर-बंगले, वाहन, रजोगुणी कर्मकांड और भोज जैसे खर्चीले प्रयास करने पड़ते हैं। कई बार यह सब करने के लिए हम भ्रष्टाचरण का भी सहारा लेने लगते हैं। कर्ज के बोझ तले भी दब जाते हैं। ये सभी बनावटी कोशिशें हमारे जीवन का असत्य हैं।

हमारे मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि कहीं हमारी वास्तविक सच्चाई प्रकट न हो जाए। वाणी के असत्य के साथ समस्या यह है कि हमें यह याद रखना पड़ता है कि हमने कहाँ क्या झूठ बोला है। यह हमारे व्यवहार को असहज बना देता है। सत्य का मतलब है हम जैसा हैं, वैसा ही स्वयं को दिखाना। ऐसा करते हुए मन में यह डर नहीं रखना कि दूसरे लोग क्या सोचेंगे। यह हमें सहज बनाता है।

लाख छिपाने से भी सत्य कभी छिप नहीं सकता। वह हमेशा प्रकट ही रहता है। भले ही वह कुछ देर के लिए हमारी या दूसरों की आँखों से ओझल रहे। सत्य को न देख पाना हमारी आँखों का दोष हो सकता है। असत्य को सत्य के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहना वास्तव में हमारे मन का भ्रम हो सकता है। क्योंकि सत्य तो हमेशा ही अपने सहज रूप में बना ही रहता है। हमारी वह सफलता क्षणिक होती है और बाद में हमारी शर्मिंदगी और ग्लानि का कारण बनती है।

सत्य केवल हमारे बोलने में ही प्रकट नहीं होता। यानी केवल सच बोलना ही सत्य नहीं है। सत्य के नियम के आधार पर सोचना, समझना, करना, होना, दिखना, दिखाना यह सब मिलकर सत्याचरण बनता है। सत्य तो हमेशा बना ही रहता है। हमारा व्यवहार केवल एक माध्यम है सत्य के प्रकट होने का। गांधीजी कहते थे कि जब हमारा सोचना, बोलना और करना तीनों में मेल हो जाता है, तो वह सत्य का आचरण होता है और इससे हमें बहुत खुशी और शांति मिलती है।

गांधीजी कहते थे कि असत्य का आचरण करना अपने लिए डर और दुःख मोल लेना है। इसलिए बोलने से पहले सोचकर बोलना चाहिए। कटु वचन या दूसरों को दुःख पहुँचानेवाली बात नहीं बोलनी चाहिए। यदि बोले बिना काम नहीं चल सकता, तो उस बात को शांति से और मुस्कुरा कर कहना चाहिए। कड़वी बात भी प्रेम और सहानुभूति के साथ कहनी चाहिए। सत्य में जटिलता नहीं होती। उसे साबित करने के लिए बहुत जोर नहीं लगाना पड़ता। उसकी कड़वाहट भी मीठी होती है। प्रतिपक्षी को भी उसकी चुभन स्वीकार्य होती है।

वर्तमान दौर में ‘हम सत्य बोलते हैं’ या ‘सत्यानुरूप आचरण करते हैं’ ऐसा कहना या मान लेना भी एक बहुत विचित्र-सा दावा है। क्योंकि चातुर्दिक असत्यमूलक वातावरण, असत्याधारित परवरिश और असत्यपोषित कार्य-व्यापार को इतनी स्वीकार्यता प्राप्त है कि उससे अलग किसी ‘सत्य’ के अस्तित्व को समझना और समझाना एक दुरूह कार्य है। विराट और व्यापक नियम रूपी ‘सत्य’ को देखने और समझने के लिए निरंतर साधना और अभ्यास की जरूरत होती है।

सत्य, ऋत, ब्रह्म, हक़, ताओ या निसर्ग के रूप में जो जीवन और जगत का अनिवार्य नियम है उसके अनुरूप होते जाने के लिए साधनामय रहनी की आवश्यकता होती है। आत्मदर्शन के पथ पर चलते हुए हमें सतत ही उस सत्य की अनुभूति होती रहती है। इस पर आगे यथास्थान चर्चा होती  रहेगी।

अव्यक्त के प्रणाम।

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