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हमारे पूर्वजों में विश्व को समझने की सहज जिज्ञासा थी। उनकी बुद्धि पर पहले के किसी ज्ञान का पर्दा नहीं था। पहले के किसी ग्रंथ, किसी शास्त्र का प्रभाव उनपर नहीं था। उन्होंने खुली आँखों से और स्वच्छ दृष्टि से संसार की एक-एक वस्तु और प्राणी को देखना-समझना शुरू किया।

अग्नि जलाती है। उसमें ताप है। यह उन्हें अपने अनुभव से समझ में आया। जल में प्रवाह है। वह भिगोता है। उससे प्यास बुझती है। लेकिन वह डुबोता भी है। वह अग्नि का शमन कर सकता है। इस तरह अग्नि और जल का नियम उन्हें समझ में आया। वायु दिखती नहीं, लेकिन वह उड़ा सकती है। वह हमारी साँसों में भी है। पेट में भी है। यह नियम उन्हें समझ में आया। इसी तरह सूर्य और चन्द्रमा की गति उन्हें समझ में आई। दिन और रात की प्रक्रिया उन्हें समझ में आई।

इस तरह वैदिक ऋषियों को दो बातें समझ में आई। एक आँखों से दिखनेवाला संसार। और दूसरा स्वानुभूति से समझ आनेवाला नियम। नियम आँखों से अदृश्य हो सकते हैं, लेकिन उनका अस्तित्व है। जीवन और जगत के प्राणी और पदार्थ नियमबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं। ये नियम उनके लिए अपरिहार्य हैं। इन विश्व-नियमों के उल्लंघन का अवश्यंभावी परिणाम होता है। वह दुःखदायी होता है। यह उन्हें समझ में आया। इन नियमों के अनुरूप होने का परिणाम सुखद होता है, यह भी उन्हें समझ में आया।

इसी सर्वव्यापी नियम को ऋषियों ने ‘ऋत’ कहा। और कहा कि इस नियम का अस्तित्व हमेशा से था, है और रहेगा। इसी ‘अस्ति’ भाव से ‘ऋत’ को ‘सत्य’ के रूप में भी लिया जाने लगा। सत्य अर्थात् जो है, हमेशा से है। वह हर प्राणी और पदार्थ में है। वही मूल तत्व है। वह सत्व है। इसलिए वह सत्य है। वह स्थिर भी है, चलायमान भी है। उसमें गतिशीलता और परिवर्तनशीलता दिखाई पड़ती है, क्योंकि वह जड़ रूप में भी चैतन्य शक्ति से संचालित है।

गतिशील होते हुए भी उसमें निरंतरता है। एक अद्भुत सामंजस्य है। ऐसा सामंजस्य है कि परमाणु का एक कण यदि सप्रयास इधर से उधर कर दिया जाए तो महाविनाशकारी विस्फोट हो सकता है। उस विराट अनंत में जहाँ पृथ्वी समेत अनिगनत गोलपिंड धूलकणों की तरह तैर रहे हैं, निर्वात, शून्य में लटके हुए अपने अक्ष पर घूम रहे हैं। सबका अपना परिक्रमा पथ है। वहाँ भी सृष्टि, जीवनकाल और विनाश का सतत नियम लागू है। लेकिन फिर भी एक व्यवस्था है, सामंजस्य है। नहीं तो कोई भी पिंड किसी से भी कभी भी जाकर टकराता रहता। यह सामंजस्य ही ऋषियों का ‘ऋतम्’ है। ऋग्वेद में तीसरे मण्डल के 54वें सूक्त का तीसरा मंत्र है-युवोर्ऋतं रोदसी सत्यमस्तु महे षु णः सुविताय प्र भूतम्। इस मंत्र का भावार्थ है कि जिस प्रकार अंतरिक्ष स्थित सूर्य और पृथ्वी अपने नियम से संचालित होकर इस सुंदर जगत का पोषण करते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्यों को भी अपना जीवन उस सत्य नियम के अनुरूप बनाना चाहिए और सत्यानुरूप ही उत्तम कर्म करने चाहिए।

इसी ‘ऋतम्’ से लैटिन का ‘रिद्मस’ या अंग्रेजी का ‘रिदम्’ शब्द बना हो सकता है। विश्व नियम में गतिशीलता के साथ ही इतनी सुसंगतता है कि वह ध्वन्यार्थक या संगीतार्थक रिदम् के रूप में प्रकट होता है। जगत की तरह ही जीवन भी अपनी सहज अवस्था में अपने सुर, लय और ताल में सुसंगत हैं। जहाँ यह सुर भटका, लय टूटा और ताल बिगड़ा, वहीं समझना चाहिए कि असत्य प्रकट हो रहा है। शरीर और मन के संबंध में भी वह सत्य नियम प्रकट होता है। मन में क्रोध उत्पन्न होता है, वह शरीर को असहज कर देता है। आँखें लाल हो जाती हैं, साँसें तेज हो जाती हैं। शरीर के विभिन्न अंगों में कंपन्न होने लगता है। मन में भय प्रकट होता है, तो भी पैर काँपने लगते हैं, धड़कन बढ़ जाती है। लोभ, वासना, पीड़ा हर ऐसी अवस्था में वह नियम शरीर पर काम करते हुए दिखता है। वह बताता है कि हमारी सहजता खो रही है। हम सत्य नियम से भटक रहे हैं। इसलिए ऐसी स्थिति में उस सत्य की चेतावनी को ध्यान से सुनना चाहिए। वापस सहजता में लौट आना चाहिए।

सांसारिक सुख-दुःख से परे सत्य की एक निरपेक्ष अवस्था भी है। वह स्वरूपज्ञान या आत्मज्ञान की, स्थितप्रज्ञता की अवस्था है। बुद्धों ने इसे ही बुद्धत्व कहा है। तीर्थंकरों ने इसे ही मोक्ष कहा है। संतों ने जिसे सहज समाधि और ‘तुरीया’ पद की अनुभूति कहा है। जहाँ सारे संकल्प-विकल्प शून्य हो जाते हैं। सूफ़ियों ने उसे ही ‘हक़ीकत’ का दर्जा दिया है। सत्य नियम का कोई कर्ता नहीं होता। वह तो स्वतःस्फूर्त होने की अवस्था है। वह किसी भी नाम, रूप आदि से मुक्त अवस्था है। उससे एकाकार होने के बाद हम साकार और निराकार के द्वंद्व से मुक्त हो जाते हैं। हम ज्ञानाकार और सत्याकार हो जाते हैं। बल्कि हम वही हो जाते हैं जो हम वास्तव में हैं या होना चाहिए।

शुक्ल यजुर्वेद के 32वें अध्याय का 12वाँ मंत्र है— परि द्यावापृथिवी सद्यऽइत्वा परि लोकान् परि दिशः परि स्वः। ऋतस्य तन्तुं विततं विचृत्य तद् अपश्यत् तद् अभवत् तद् आसीत्॥

विश्व नियम रूपी सत्य को समझानेवाला यह मंत्र कितना अद्भुत है। इसका अर्थ है- ‘समस्त अंतरिक्ष, समस्त पृथ्वी, समस्त लोकों में, समस्त दिशाओं में और समस्त स्वानुभूतियों में विश्वव्यापी नियम के तंतु फैले हुए हैं। किन्तु जो उनको भी चीरकर पार दृष्टि वाला हो जाता है, वह तत्काल ही उस सत्य को देख लेता है। वह वही हो जाता है। वह वही है ही।’

अव्यक्त के प्रणाम।

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