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क्रांति क्या है ?  जब क्रमण करते हैं, आगे की ओर बढ़ते हैं, तब क्रांति होती है। जीवन और जगत गतिशील हैं। हम चाहें या न चाहें, वहाँ प्रतिक्षण क्रांति हो रही है। हमें दिखाई न दे तो इसमें क्रांति का क्या दोष? जीवन में क्रमण यदि उन्नति की दिशा में हो, तो उत्क्रमण होगा, उत्क्रांति होगी। हम पूर्णता की दिशा में बढ़ेंगे। लेकिन जीवन का यही क्रमण यदि अवनति की दिशा में, तो वह व्यतिक्रमण होगा, व्यतिक्रांति होगी। उत्क्रांति का क्रम टूट जाएगा। हम पतन की दिशा में नीचे की ओर गिरेंगे।

‘क्रांति’ शब्द बहुत गूढ़ अर्थों वाला है। उसका कुछ अर्थ से अनर्थ भी हुआ हो सकता है। जैसे ही क्रमण की गति को जबरन खींचने की कोशिश करेंगे, तो सहजता खो जाएगी। जैसे ही किसी त्वरा या आवेश में क्रमण की गति बढ़ाने की कोशिश करेंगे, तो वहाँ ‘अतिक्रमण’ होगा। ऐसे अतिक्रमण में सहजता पर ‘आक्रमण’ होना ही है। वहाँ सूक्ष्म और प्रकट, दोनों प्रकार की हिंसा की आशंका उत्पन्न होगी। एक मनुष्य के लिए दूसरे मनुष्य को आक्रांत करने की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इस तरह वह क्रांति की जगह ‘आक्रांति’ हो जाएगी।

सत्यद्रष्टा ऋषियों, संतों, बुद्धों और तीर्थंकरों ने इसलिए सम्यक क्रमण यानी संक्रमण और संक्रांति का मार्ग बताया है। आज संक्रमण और संक्रांति को भी नकारात्मक अर्थों में प्रयोग करने का चलन हुआ है। लेकिन संक्रमण और संक्राति का विधायक अर्थ समझना चाहिए। सूर्य तो अविचल है, लेकिन क्रियाशील है। उसकी ऊष्मा, उसका प्रकाश सतत् गतिशील है। हम कहते हैं सूर्यनारायण उत्तरायण हुए। सूर्यनारायण उत्तरायण हुए या हमें धारण करनेवाली यह धारित्री धरती माता दक्षिणायण हुईं?

इस तरह नैसर्गिक नियम में कहीं भी न तो व्यतिक्रमण, न अतिक्रमण है और न आक्रमण है। वहाँ तो मृत्यु भी उत्क्रमण ही है। उसकी ओर शनैः शनैः बढ़ने के लिए संक्रमण का मार्ग विहित है। संक्रमण याने क्या? संक्रमण याने न तो बहुत तेजी से क्रमण, न बहुत धीरे-धीरे। बल्कि सम्यक रूप से क्रमण। हमारे क्रमण का या क्रांति का स्वरूप जब सम्यक होगा, समता में होगा, तो वह संक्रमण होगा। तब उसे संक्रांति कहेंगे।

जब जीवन की दिशा स्पष्ट होगी, तब हम नैसर्गिक नियमों की अनुभूति कर उसके अनुकूल होते जाएंगे। तब हड़बड़ाहट नहीं होगी, असहजता नहीं होगी। तब हम अभी की तरह हर-हमेशा भयाक्रांत नहीं रहेंगे। तब स्वयं के साथ या दूसरों के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करेंगे। प्रचलित अर्थों वाली क्रांति नहीं करेंगे। तब हमारी चाल सहज होगी। अनंत ब्रह्मांड में धूलकणों की तरह तैर रहे अनगिनत गोलपिंडों की तरह हम भी नियत चाल से संक्रांति करेंगे। उल्कापिंडों की तरह व्यतिक्रांति करके आत्महननकारी अकालमृत्यु का शिकार नहीं होंगे। हम सजग होकर, हर क्षण परिपक्वतर होते हुए पूरण परमानंद रूपी मृत्यु की ओर संक्रमण करेंगे, संक्रांति करेंगे।

सूफ़ियों और क़ामिल मुर्शिदों ने इसी बात को दूसरी तरह से कहा। कहा कि तमाम ‘कदूरत’ यानि दुनियावी और जिस्मानी गंदगी से दूर होओ। केवल ‘कसीफ़’ यानी जड़ पदार्थ और इन्द्रिय भोग में न फँसे रहो। पतन के गर्त में ही ‘रुजू’ (व्यतिक्रांति) न करते रहो। लतीफ़ यानी चैतन्य शक्ति की ओर भी संक्रांति करो। तब जाकर ‘सूरत ख़लासी’ यानी असल मुक्ति और मोक्ष को प्राप्त करोगे। फिर चाहे उसे ब्रह्म कह लो, परमेश्वर कह लो, परमात्मा कह लो या खुदा कह लो, नियम कह लो, ऋत कह लो, हक़ कह लो या सत्य कह लो।

गृहस्थ लोग, सरागी लोग इस संक्रांति को बहुत कठिन या असंभव मानकर न बैठ जाएँ। चाहे किसी भी विधि आए, मृत्यु तो आनी ही है। परमानंद तो तभी है जब हम ऋषियों की भाषा में ‘उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्’ की ओर नैसर्गिक चाल और सम्यक चरित्र के साथ क्रमण करेंगे। तभी हम सुपक्व लौकी या ककड़ी की तरह पुष्टता और पूर्णता को प्राप्त करके मृत्यु का वरण करेंगे। क्रांतदर्शी संतों ने जिस तरह हद-अनहद के पार सत्यलोक की अनुभूति की। जीवन-साधना में अपनी सम्यक रहनी के माध्यम संक्रांति की, उसी तरह हम भी करेंगे, बरतेंगे।

क्रांति करने की चीज नहीं है। संक्राति करते हैं तो क्रांति होती ही रहती है। क्रांति तो संक्रांति में ही निहित है। इसलिए क्रांति कभी स्थायी नहीं होती। चित्त की समता और जीवन-मार्ग की सम्यकता से ही संक्रांति हो सकती है। अपने अपरिहार्य जीवन क्रमण अर्थात् अपनी दैनंदिन जीवन-चर्या को अपने विवेक से सम्यक बनाएंगे, तो नैसर्गिक संक्रांति से साथ एकरूप, एकाकार होते जाएंगे। सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र से ही संक्रांति अर्थात् सम्यक क्रांति के सत्य का सम्यक दर्शन होता है। यह करके देखने की चीज है। बुद्धि के स्तर पर समझ लेने का दावा करना ठीक नहीं है। सत्याचरण करके संक्रांति को सर्वत्र नित्य घटित होते हुए देख लिया, तो वह सम्यक दर्शन बन जाता है। इस अवस्था में सम्यक दर्शन ही निमित्त और उपादान दोनों बन जाते हैं।

जिनेश्वर भगवान ने ऐसे क्रमण के लिए धर्म के रथ को ही साधन बताया और कहा कि इस धर्मरथ पर बहुत आराम है- धम्मारामे चरे भिक्खू, धिइमं धम्मसारही’– धैर्यवान होकर धर्मरथ को चलानेवाला सारथी बनो। जीवन में, समाज में क्रांति और संक्रांति का सत्य यही है।

~अव्यक्त

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